मेरा स्वप्न
मुझे बाहर का खाना बहुत पसंद है इसीलिए मैंने मां की बात को सुनकर भी अनसुना कर दिया और झोला लेकर घर से चला गया । गांव से शहर जाने का मुख्य रास्ता कुछ 3 से 4 मील की दूरी पर था । सड़क तक जाने के लिए गांव से खेतों और पेड़ों के बीच से एक कच्चा और संकरा रास्ता जाता है, जिससे मुझे पैदल ही मुख्य रास्ते तक पहुंचना था। मैं दिन के करीब 11 बजे मेरठ पहुंच कर रजिस्टार कार्यालय पहुंच गया। सरकारी काम था तो काम होते होते शाम का 6 बज गया । मैं वहां से निकला और सीधा पहुंच गया अपनी पसंदीदा नत्थू पूड़ी वाले की दुकान पर जो कि कार्यालय से बाईं ओर कुछ ही दूरी पर थी । पेट भर कर खाने के बाद जब बस स्टैंड पहुंचा तो पता चला कि मेरे गांव की तरफ जाने वाली बस स्टैंड से तकरीबन रात के 8 बजे निकलेगी । मेरे पास स्टैंड पर इंतज़ार करने के सिवाय दूसरा कोई चारा भी न था। स्टैंड से करीब 7 : 50 बजे बस निकली । शहर से मेरे गांव तक पहुंचने में करीब डेढ़ घंटे लगता है। मैं वही कोई 9:30 बजे अपने गांव जाने वाली पगडंडी के सामने बस से उतरा और अपने गांव की तरफ बढ़ चला बस अभी भी खड़ी थी शायद कोई और उतर या चढ़ रहा था।
अंधेरी रात थी इसलिए चारों और बस अंधेरा और सन्नटा था। मैं अपना समान लेकर पगडंडी पर अपने गांव की ओर बढ़ चला हवा की सांय सांय आवाज कानों के पर्दों को चीरते हुए अन्दर जा कर दिल तक झकझोर रही थी ...
मैं डरा सहमा हुआ तेजी से अपने गंतव्य की ओर बढ़ा जा रहा था। मन में तमाम उल्टे पुल्टे ख्याल आ रहे थे जो कि उस सूनसान रास्ते को मेरे लिए और भयावह बना रहें थे।मैं अपने उन ख्यालों से निकलने के लिए कुछ सकारात्मक सोचने की कोशिश करता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था........
सोच रहा था काश कोई ऐसा होता जो इन अंधेरी रात भरी पगडंडी पर चल कर मेरी मंजिल तक मेरा साथ निभा रहा होता। मेरे मन में ये ख्याली पुलाव पक ही रहे थे कि अचानक से मेरे कंधे पर एक नरम स्पर्श सा महसूस हुआ और चूड़ियां खनकने की आवाज मेरे कानों में पड़ी तो मैं क्षण भर में ही ख्याली दुनिया से बाहर उस क्षण में आ गया। अंधेरे से भरी रात और उस सूनसान रास्ते पर मैं उस स्पर्श से इतना डर गया कि मेरा पूरा चेहरा कांप उठा ओर माथे पर पसीने कि बूंदों ने भी झलकना शूरू कर दिया। उसका हाथ खनखन की आवाज के साथ मेरे कंधे से सरकता हुआ मेरे हाथों की ऊंगलियों में आकर फस चुका था, लगा मानों लगा कि कोई साथ चाहता है । मैंने डरते हुए पलट कर नीचे देखा ... तो मेरा हाथ किसी के हाथों में था.... उस कृष्ण रात में भी उसके हाथ चांदनी से चमक रहे थे...... नज़रे ऊपर उठी तो उसकी पतली कलाई पर लाल चूड़ियां थी। मैंने अचानक से सर उठा कर देखा तो उसका भरा हुआ चेहरा तो उसकी चमकती आंखे मानो मुझ से कहने की कोशिश कर रही हों की अब मंजिल तक जाने में डर कैसा ? मैं हूं ना .......मैं उससे कुछ कहता उससे पहले ही वो बोल उठी कि इस रास्ते पर मेरे साथ चलोगे .....उसके मुख से ये सुनते ही मेरे जान में जान आई लेकिन मन ही मन उसके अनजान होने का डर सता रहा था,लेकिन मैं करता भी क्या उस सन्नाटे से गूंजते हुए रास्ते में एक से भले दो सही ...... मैंने उसको सिर हिलाकर हां कह दिया अब हम दोनों साथ चल रहे थे उसने मेरे हाथों की ऊंगलियों में अपनी ऊंगलियां कस कर फसा रखी थी, उसका कंधा मेरे कंधे को बार बार घिस रहा था। कुछ पल पहले जो खनखन की आवाज डरावनी थी अब वो कानों को सुकून दे रही थी ...... हम दोनों चुप चाप एक दुसरे की सांसे सुनते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे। मैं मन ही मन खुश हुआ जा रहा था होता भी क्यों ना आखिर मेरे मन में पक रहे ख्याली पुलाव अब सच जो हो रहे थे। थोड़ी देर आगे चलते हुए मैंने हिम्मत करके उससे पूछा कि इतनी देर रात अकेले कैसे तो उसने बताया कि वो मेरे गांव के सामने वाले गांव के चौधरी जी की बेटी की शहर की दोस्त है। वो अपनी दोस्त से मिलने जा रही थी और रास्ते में उसकी गाड़ी खराब हो गई जिससे उसे बस से आना पड़ा इसीलिए रात हो गई । अब मेरी हिम्मत बढ़ चुकी थी मैं रास्ते भर उससे बाते करता रहा ऐसा प्रतीत ही भी नहीं हो रहा था कि हम पहली बार मिल रहे थे। वो अंधेरे से भरा हुआ रास्ता कब पार हो गया पता ही नहीं चला । हम दोनों गांव के बाहर वाले तिराहे पर खड़े थे । दोनों गांवों में जल रहीं बत्तियां साफ दिखाई दे रहीं थीं। अब हम दोनों को अपने अपने गांव की तरफ जाना था। हम दोनों ने एक दुसरे कि ओर उदास मन से देखा , मानों दोनो की आंखे कहना चाह रही हो कि काश ये पल यहीं ठहरा रहे । हम दोनों मुड़कर अपने अपने गांव की तरफ चल दिए। मैं बस रास्ते पर बढ़ा ही था कि वो दौड़कर कर आयी और मेरे हाथ पकड़कर मेरे हाथ में एक कागज का टुकड़ा रखकर मुस्कुराती हुई चली गई। मैं वो टुकड़ा खोल ही रहा था कि कानों में एक धड़ाम को आवाज सुनाई दी और टुकड़ा खुलने से पहले मेरी आंख खुल चुकी थी सामने देखा तो मेरी अलमारी में रखी रामायण की पुस्तक नीचे गिरी पड़ी हुई थी और उसके पास ही पड़ा हुआ था स्याही में सना हुआ कागज़ का टुकड़ा..........

2 Comments
मुझे तो ये कल्पना हकीकत से रूबरू करा दिया
ReplyDeleteBahut accha likha hain bhaiii
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